Bhagavata Puran, Bhagavata Puran Pdf Hindi 2023

भागवत पुराण (Bhagavata Puran) एक पवित्र हिंदू पाठ है जो भगवान विष्णु, उनके विभिन्न अवतारों और अन्य हिंदू देवताओं की कहानियों को बताता है। 8वीं और 10वीं शताब्दी सीई के बीच रचित, पाठ में 12 पुस्तकें और 18,000 से अधिक छंद शामिल हैं

।। भागवत पुराण ।।

Bhagavata Puran

  • भागवत पुराण का परिचय :-

यह हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक ग्रंथों में से एक माना जाता है, और भक्ति, नैतिकता और आध्यात्मिकता पर अपनी शिक्षाओं के लिए सम्मानित है। भागवत पुराण (Bhagavata Puran) मुख्य रूप से भगवान कृष्ण के जीवन और शिक्षाओं पर केंद्रित है, जो विष्णु के सबसे महत्वपूर्ण अवतारों में से एक हैं, और उनके भक्तों के साथ उनकी बातचीत। पाठ का हिंदू संस्कृति और आध्यात्मिकता पर गहरा प्रभाव पड़ा है, और दुनिया भर के हिंदुओं द्वारा इसका व्यापक रूप से अध्ययन और सम्मान किया जाता है।भागवत पुराण (Bhagavata Puran) एक हिंदू धार्मिक ग्रंथ है और 18 प्रमुख पुराणों में से एक है। इसे हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक ग्रंथों में से एक माना जाता है, और इसे अक्सर “पांचवें वेद” के रूप में जाना जाता है।

पाठ में 12 पुस्तकें और 18,000 से अधिक छंद हैं, और माना जाता है कि 8 वीं और 10 वीं शताब्दी सीई के बीच रचित किया गया था। भागवत पुराण मुख्य रूप से भगवान कृष्ण की पूजा के लिए समर्पित है, और उनके जीवन, शिक्षाओं और गतिविधियों का विस्तार से वर्णन करता है। इसमें अन्य हिंदू देवताओं की कहानियां और मनुष्यों के साथ उनकी बातचीत के साथ-साथ नैतिकता, नैतिकता और आध्यात्मिकता सहित हिंदू धर्म के विभिन्न पहलुओं पर दार्शनिक चर्चा भी शामिल है।

अष्टादश पुराणों में भागवत नितान्त महत्वपूर्ण तथा प्रख्यात पुराण है। पुराणों की गणना में भागवत अष्टम पुराण के रूप में परिगृहीत किया जाता है। भागवत पुराण में महर्षि सूत जी उनके समक्ष प्रस्तुत साधुओं को एक कथा सुनाते हैं। साधु लोग उनसे विष्णु के विभिन्न अवतारों के बारे में प्रश्न पूछते हैं। सूत जी कहते हैं कि यह कथा उन्होने एक दूसरे ऋषि शुकदेव से सुनी थी। इसमें कुल बारह स्कन्ध हैं। प्रथम स्कन्ध में सभी अवतारों का सारांश रूप में वर्णन किया गया है।

  • देवीभागवत
  • श्रीमद्भागवत

विविध प्रकार से समीक्षा करने पर अन्ततः यही प्रतीत होता है कि श्रीमद्भागवत को ही पुराण मानना चाहिए तथा देवीभागवत को उपपुराण की कोटि में रखना उचित है। परंतु देवीभागवत ‘भागवत’ की गणना उपपुराणों के अंतर्गत करता है तथा अपने आपको पुराणों के अंतर्गत। देवीभागपंचम स्कंध में वर्णित भुवनकोश श्रीमद्भागवत के पंचम स्कंध में प्रस्तुत इस विषय का अक्षरश: अनुकरण करता है। श्रीभागवत में भारतवर्ष की महिमा के प्रतिपादक आठों श्लोक देवी भागवत में अक्षरश: उसी क्रम में उद्धृत हैं । दोनों के वर्णनों में अंतर इतना ही है कि श्रीमद्भागवत जहाँ वैज्ञानिक विषय के विवरण के निमित्त गद्य का नैसर्गिक माध्यम पकड़ता है, वहाँ विशिष्टता के प्रदर्शनार्थ देवीभागवत पद्य के कृत्रिम माध्यम का प्रयोग करता है।

श्रीमद्भागवत भक्तिरस तथा अध्यात्मज्ञान का समन्वय उपस्थित करता है। भागवत निगमकल्पतरु का स्वयंफल माना जाता है जिसे नैष्ठिक ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मज्ञानी महर्षि शुक ने अपनी मधुर वाणी से संयुक्त कर अमृतमय बना डाला है। स्वयं भागवत में कहा गया है

सर्ववेदान्तसारं हि श्रीभागवतमिष्यते।
तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित् ॥
श्रीमद्भाग्वतम् सर्व वेदान्त का सार है। उस रसामृत के पान से जो तृप्त हो गया है, उसे किसी अन्य जगह पर कोई रति नहीं हो सकती।

  • भागवत पुराण की टीकाएँ :-

श्रीधर स्वामी की टिप्पणी: श्रीधर स्वामी 14वीं शताब्दी के वैष्णव विद्वान थे, जिन्होंने पाठ के भक्ति पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए भागवत पुराण पर एक विस्तृत टिप्पणी लिखी थी।

जीवा गोस्वामी की टिप्पणी: जीवा गोस्वामी 16वीं शताब्दी के एक धर्मशास्त्री और दार्शनिक थे जिन्होंने भागवत पुराण पर एक टिप्पणी लिखी थी जिसमें भगवान के प्रति समर्पण और उनके साथ एक व्यक्तिगत संबंध विकसित करने के महत्व पर जोर दिया गया था।

विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की टिप्पणी: विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर 18वीं शताब्दी के विद्वान थे जिन्होंने भागवत पुराण पर एक टिप्पणी लिखी थी जिसने पाठ के दर्शन और धर्मशास्त्र का विस्तृत विश्लेषण प्रदान किया था।

बलदेव विद्याभूषण की टिप्पणी: बलदेव विद्याभूषण 18वीं शताब्दी के एक विद्वान थे जिन्होंने भागवत पुराण (Bhagavata Puran) पर एक टिप्पणी लिखी थी जिसमें वेदांत दर्शन के लेंस के माध्यम से पाठ के संदेश को समझने के महत्व पर जोर दिया गया था।

भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की टिप्पणी: भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद 20वीं सदी के गुरु और इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (इस्कॉन) के संस्थापक थे, जिन्होंने भागवत पुराण पर एक टिप्पणी लिखी थी जिसमें दैनिक जीवन में इसकी शिक्षाओं के व्यावहारिक अनुप्रयोग पर जोर दिया गया था।

  • भागवत पुराण का प्रभाव :-

भक्ति का प्रचार: भागवत पुराण (Bhagavata Puran) मुक्ति प्राप्त करने के प्राथमिक साधन के रूप में भगवान को भक्ति (भक्ति) के महत्व पर जोर देता है। इसका हिंदुओं की भक्ति प्रथाओं के साथ-साथ हिंदू धर्म के भीतर भक्ति आंदोलनों के विकास पर एक बड़ा प्रभाव पड़ा है।

कृष्ण अवतार की लोकप्रियता: भागवत पुराण ने भगवान कृष्ण की पूजा को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिन्हें विष्णु के सबसे महत्वपूर्ण और प्रिय अवतारों में से एक माना जाता है। इससे हरे कृष्ण आंदोलन सहित कई कृष्ण-केंद्रित परंपराओं का विकास हुआ है।

हिंदू दर्शन की उन्नति: भागवत पुराण (Bhagavata Puran) में नैतिकता, नैतिकता और आध्यात्मिकता जैसे विषयों पर कई दार्शनिक चर्चाएँ शामिल हैं, जिन्होंने हिंदू दर्शन और धर्मशास्त्र के विकास में योगदान दिया है।

भारतीय कला और साहित्य पर प्रभाव: भागवत पुराण (Bhagavata Puran) की कहानियों और शिक्षाओं ने पूरे भारतीय इतिहास में कला और साहित्य के अनगिनत कार्यों को प्रेरित किया है, जिसमें पेंटिंग, मूर्तियां, संगीत और नृत्य शामिल हैं।

आध्यात्मिक साधकों के लिए प्रेरणा: भागवत पुराण सभी पृष्ठभूमि के आध्यात्मिक साधकों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है, जो आत्म-साक्षात्कार और ज्ञान के मार्ग पर मार्गदर्शन और प्रेरणा प्रदान करता है।

  • भागवत पुराण की संरचना :-

भागवत में 18 हजार श्लोक, 335 अध्याय तथा 12 स्कन्ध हैं। इसके विभिन्न स्कंधों में विष्णु के लीलावतारों का वर्णन बड़ी सुकुमार भाषा में किया गया है। परंतु भगवान्‌ कृष्ण की ललित लीलाओं का विशद विवरण प्रस्तुत करनेवाला दशम स्कंध भागवत का हृदय है। अन्य पुराणों में, जैसे विष्णुपुराण (पंचम अंश), ब्रह्मवैवर्त (कृष्णजन्म खंड) आदि में भी कृष्ण का चरित्‌ निबद्ध है, परंतु दशम स्कंध में लीलापुरुषोत्तम का चरित्‌ जितनी मधुर भाषा, कोमल पदविन्यास तथा भक्तिरस से आप्लुत होकर वर्णित है वह अद्वितीय है। रासपंचाध्यायी (10.29-33) अध्यात्म तथा साहित्य उभय दृष्टियों से काव्यजगत्‌ में एक अनूठी वस्तु है। वेणुगीत (10.21), गोपीगीत, (10.30), युगलगीत (10.35), भ्रमरगीत (10.47) ने भागवत को काव्य के उदात्त स्तर पर पहुँचा दिया है।

  • भागवत के १२ स्कन्द निम्नलिखित कोण से हैं :-

स्कन्ध संख्या विवरण
प्रथम स्कन्ध भक्तियोग और उससे उत्पन्न एवं  वैराग्य का वर्णन किया गया है।
द्वितीय स्कन्ध ब्रह्माण्ड की उत्त्पत्ति का स्वरूप।
तृतीय स्कन्ध उद्धव द्वारा भगवान् का वर्णन।
चतुर्थ स्कन्ध राजर्षि ध्रुव का चरित्र।
पंचम स्कन्ध समुद्र, पर्वत, नदी, पाताल, नरक आदि की स्थिति।
षष्ठ स्कन्ध देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के जन्म की कथा।
सप्तम स्कन्ध हिरण्यकश्यिपु, हिरण्याक्ष के साथ प्रहलाद का चरित्र।
अष्टम स्कन्ध गजेन्द्र मोक्ष, मन्वन्तर कथा, वामन अवतार
नवम स्कन्ध राजवंशों का विवरण। श्रीराम की कथा।
दशम स्कन्ध भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाएं।
एकादश स्कन्ध यदु वंश का संहार।
द्वादश स्कन्ध विभिन्न युगों का स्वरूप।

 

  • भागवत पुराण Video :-

 

Credit – Saregama Bhakti

इन्हे भी देखें – ऋग्वेद , सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद,

पुराण,    ब्रह्माण्ड पुराण,    गरुड़ पुराण,    मत्स्य पुराण,   कूर्म पुराणवामन पुराण,

 

FAQ :
  • भागवत कराने से क्या लाभ होता है ?                                                                                                 -आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि: भागवत पुराण भगवान, ब्रह्मांड और मानव अनुभव की प्रकृति में गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है, जो आध्यात्मिकता और वास्तविकता की प्रकृति की गहरी समझ विकसित करने में मदद कर सकता है।

 

  • भागवत पुराण क्यों महत्वपूर्ण है ?                                                                                                       – चनात्मकता के लिए प्रेरणा: भागवत पुराण की कहानियों और शिक्षाओं ने पूरे भारतीय इतिहास में कला, साहित्य और संगीत के अनगिनत कार्यों को प्रेरित किया है, और रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए प्रेरणा के स्रोत के रूप में काम कर सकते हैं।

 

  • भागवत जी का मूल मंत्र क्या है ?                                                                                                        – ।। अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्ण:दामोदरं वासुदेवं हरे। श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकी नायकं रामचन्द्रं भजे।।

Bhagavata Puran

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